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Saturday, May 24, 2025

न्यूजीलैंड के लुप्तप्राय काकापो तोतों की आबादी बढ़ाने के लिए कृत्रिम गर्भाधान तकनीक में महत्वपूर्ण सफलता हासिल

न्यूजीलैंड के लुप्तप्राय काकापो तोतों की आबादी बढ़ाने के लिए वैज्ञानिकों ने कृत्रिम गर्भाधान तकनीक में महत्वपूर्ण सफलता हासिल की है। यह कार्य जर्मनी की जस्टस लिबिग यूनिवर्सिटी गिएसन, न्यूजीलैंड के डिपार्टमेंट ऑफ कंज़र्वेशन, काकापो रिकवरी प्रोग्राम और ओटागो विश्वविद्यालय की संयुक्त टीम द्वारा संपन्न किया गया।

काकापो: उड़ानहीन, भारी और विशिष्ट तोता
काकापो दुनिया का सबसे भारी तोता है और यह उड़ नहीं सकता। यह केवल न्यूजीलैंड में पाया जाता है और यूरोपीय उपनिवेशवादियों के आगमन के बाद से इसकी संख्या में भारी गिरावट आई है। इसकी प्रजनन दर बहुत धीमी है और यह एकमात्र ऐसा तोता है जो ‘लेक-बिल्डिंग’ व्यवहार अपनाता है—जहाँ नर पक्षी ज़मीन में कटोरे के आकार का गड्ढा बनाकर उसमें ज़ोर से आवाज़ करते हैं जिससे उनकी पुकार घाटियों में गूंजती है।

संकट में काकापो: प्राकृतिक शिकारी और प्रजनन समस्याएँ
हाल के वर्षों में, जहाजों से आए चूहे, नेवले और स्टोट जैसे शिकारी काकापो के लिए बड़ा खतरा बन गए हैं। इन खतरों से बचाने के लिए संरक्षणवादियों ने इन्हें शिकारी-रहित द्वीपों पर स्थानांतरित किया और 2009 से कृत्रिम गर्भाधान के प्रयोग शुरू किए। 2019 तक इनकी संख्या 142 तक पहुँच गई, लेकिन कम उपजाऊता और उच्च भ्रूण मृत्यु दर के कारण वृद्धि रुक-सी गई थी।

नई तकनीक: प्रजनन दर में उल्लेखनीय वृद्धि
हाल ही में वैज्ञानिकों ने एक नई कृत्रिम गर्भाधान तकनीक अपनाई जिसमें परंपरागत उदर मालिश के साथ-साथ विद्युत उत्तेजना का प्रयोग भी किया गया। 20 नर काकापो से एकत्रित किए गए वीर्य को गुणवत्ता के आधार पर जांचा गया और सर्वश्रेष्ठ नमूनों का उपयोग 12 मादाओं के गर्भाधान के लिए किया गया।
इस तकनीक के परिणाम उत्साहजनक रहे:

पहले क्लच की तुलना में दूसरे क्लच में उर्वरता दर 29.4% से बढ़कर 70% हो गई।
चार चूजों की पुष्टि कृत्रिम गर्भाधान के प्रत्यक्ष परिणाम के रूप में हुई।
भविष्य की योजना और महत्व
शोधकर्ताओं का मानना है कि यह तकनीक व्यवहारिक और प्रभावी है तथा इससे काकापो की प्रजनन दर में स्थायी सुधार किया जा सकता है। अगली प्रजनन ऋतु में वे इस प्रक्रिया को दोहराकर और अधिक सकारात्मक परिणाम प्राप्त करने की योजना बना रहे हैं।
यह उपलब्धि न केवल काकापो के संरक्षण की दिशा में एक महत्वपूर्ण मील का पत्थर है, बल्कि यह अन्य संकटग्रस्त प्रजातियों के लिए भी एक नई राह खोल सकती है।

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